शिक्षा में स्वराज
गणित बनाम मैथमेटिक्स
(Decolonisiation of education: ganita vs mathematics)

चंद्रकांत राजू (C. K. Raju)

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला

(Indian Institute of Advanced Study, Shimla)

भूमिका

उपनिवेशवादी शिक्षा प्रणाली ने हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाया.

  • यह चर्च कि शिक्षा प्रणाली थी
  • इसका मूल उद्देश्य cleric (मिशनरी) बनाना था clerk बनाना नहीं
  • यह शिक्षा प्रणली यहाँ आने के बहुत पहले से.
  • मिशनरियों को अन्धविश्वासी और आज्ञाकारी बनाने के लिए डिजाईन करी गयी.

शिक्षा प्रणाली चर्च की, मैकॉले की या ब्रिटिश हुकूमत की नहीं

  • मैकॉले को (या ब्रिटिश हुकूमत को दोष देना गलत है)
  • यह शिक्षा प्रणाली दुनिया भर में हावी हुई
  • फ़्रांसीसी, डच, पुर्तगाली या स्पेन की हुकूमत में भी
  • जहाँ न मैकॉले पहुंचा न ब्रिटिश हुकूमत.

सिर्फ  मिशन स्कूल ही नहीं 

विश्वविद्यालय के chancellor, और vice chancellor, क्रिस्तानी बिशप के आधीन थे.

और यह भी बात ध्यान में रहे कि सारी दुनिया में यह शिक्षा प्रणाली चर्च कि संस्थाएं लायीं

  • आज भी विज्ञान के सबसे अच्छे कालेज, जैसे St. Stephen's, चर्च के हैं.

आत्मनिर्भरता?

  • वैसे भी आजादी के ७२ साल बाद भी
  • हमने यह शिक्षा प्रणाली नहीं बदली, तो मैकॉले को क्यों दोष दें?

एक लाइन नहीं बदली

  • पिछले साल जावड़ेकर जी का बयान आया
  • कि हमने एक लाइन नहीं बदली है
  • किसी भी पाठ्यपुस्तक में

किसी और शिक्षा मंत्री से आग्रह किया कि

  • हमारी शास्त्रार्थ की परंपरा के अनुसार
  • एक दिन की सार्वजनिक बहस की जाय गणित की शिक्षा पर
  • मंत्री जी ने इंकार किया यह कहकर कि "मेरे हाथ में होता तो एक मिनट में कर देता. मेरे हाथ में कुछ नहीं."

पहला कदम

  • जो 72 साल में एक लाइन नहीं बदल पाए
  • उसके बारे में सोचने से भी घबराते है.
  • उनके लिए आत्म निर्भरता दूर का ख्वाब है
  • आजादी की तरफ पहला ठोस कदम तो उठाएं

किसी एक विषय का एक अंश ही बदलने की ठाने.

पहला कदम किस दिशा में उठाना उचित है?

  • पहले दुश्मन की चाल समझें

दो लालच

  • औपनिवेशिक शिक्षा नें हमें दो लालच दिए
  • बड़ी नौकरी
  • और विज्ञान

कोई भी बदलाव का इन में से एक से वास्ता होना ज़रूरी है

  • नहीं तो उस बदलाव का कोई असर नहीं होगा.
  • याने कि हमारी पूर्व कालीन महानता की बात बार-बार दोहराने से
  • (और उसके साथ कई एक झूठ जोड़ देने से) कुछ नहीं होगा
  • हम केवल हंसी के पात्र बनेंगे

हमारी पुरानी संस्कृति का आज की तारीख में क्या महत्व है? (contemporary value of ancient Indian culture)

  • यह स्पष्ट समझाना होगा
  • ख़ास तौर से विज्ञान के सन्दर्भ में.

इसलिए मैंने गणित विषय चुना है.

  • विज्ञान गणित पर आधारित है.
  • तो गणित की शिक्षा बदलने से विज्ञान की शिक्षा पर असर पड़ेगा

अतीत में गणित में हमारी बहुत सारी उपलब्धियां थी.

लेकिन आज की शिक्षा में हमारी प्राचीन उपलब्धियों का कुछ महत्व बचा है क्या?

  • खास तौर से आधुनिक विज्ञान के सन्दर्भ में या उसकी शिक्षा में?

एक और कारण से मैं विज्ञान की बात बार-बार दोहरा रहा हूं

  • हमें जज्बाती आवेश में आकर यह नहीं कहना चाहिए कि
  • “यह गणित हमारा था इसलिए (संस्कृति के संरक्षण के लिए) इसका इस्तेमाल करें”
  • बल्कि हमें यह कहना चाहिए कि
  • “यह गणित बेहतर है इसलिए इसका आज इस्तेमाल करें”

विज्ञान में जज्बात के लिए कोई जगह नहीं.

अगर केवल संस्कृति के संरक्षण की बात सोचते हैं तो वह हिनुद्स्तान तक सीमित रह जाएगी

  • लेकिन विज्ञान तो विश्वव्यापी है.
  • (और हम हमेशा विश्वगुरु होने की बात करते हैं.)

डिकॉलोनाइजेशन या स्वराज के मामले में भी हिंदुस्तान पीछे चल रहा है

  • 10 साल पीछे

उपनिवेशवाद और उससे जुडी चर्च शिक्षा सिर्फ हमारा प्रॉब्लम नहीं है,

जिन्हें यह बात पसंद नही

  • वे पहले क्रिकेट छोड़ कर दिखाएँ!
  • सचिन तेंदुलकर का भारत रत्न वापस लें!

स्वराज का मतलब कतई यह नहीं कि हर एक पश्चिमी चीज को हम ठुकरा दें

  • स्वराज का मतलब है कि हम अपनी अक्ल लगाएं और अपने हित के बारे में सोचें.
  • क्या चीज़ अपनाना और क्या छोड़ना यह हमारा फैसला होना चाहिए.
  • यह मुश्किल है, क्योंकि औपनिवेशिक शिक्षा ठोक-ठोक कर केवल नकल करना सिखाती है.

विपक्ष की बात समझना और पूर्व पक्ष का खंडन करना

  • हमारी पुरानी परंपरा रही है.
  • अगर हमारा पक्ष पूर्व पक्ष से भिन्न है
  • तो अपना पक्ष रखने से पहले पूर्व पक्ष का खंडन करना ज़रूरी है.
  • यह आजकल दिखाई नहीं देता.

हमारे हित की बात बंद कमरे में कोई विदेशी विशेषज्ञ या उनके पिट्ठू नहीं बता सकते.

  • क्योंकि वह कभी पश्चिमी पूर्व पक्ष का खंडन नहीं करेंगे.

हमारी परंपरा में सच्चाई सार्वजनिक वाद विवाद (शास्त्रार्थ) पर आधारित होना जरूरी है

  • उसी में पारदर्शिता है.
  • विदेशी विशेषज्ञों (या उनके पिट्ठुओं) की बात आंख मूंदकर ना माने
  • वो गलती करते हैं.

उदाहरण के लिए आज हम इसाई कैलेंडर का इस्तेमाल करते हैं

  • जैसे कि हमारी कैलंडर कमिटी के विशेषज्ञों ने बताया.
  • यह सही है कि सरकार हिंदुस्तानी पंचांग भी बांटती है
  • लेकिन इसाई (ग्रेगोरियन) कैलंडर अहम् है.
  • आपके पासपोर्ट में या आधार कार्ड में आपका जन्मदिन इसाई कैलेंडर पर ही बताया जाता है

ईसाई कैलंडर ना केवल एक बेकार कैलेंडर है बल्कि इससे हमारी खेती को और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है

  • क्योंकि हमारी खेती अभी भी बारिश पर निर्भर है
  • और ईसाई कैलंडर बारिश का मौसम सही नहीं दर्शाता

यह अलग बात है कि इस कैलेंडर के सहारे हमारे दिमाग में अहम् ईसाई अंधविश्वास घुसा दिए जाते हैं

  • यानि हमें नुक्सान होता है, और चर्च को फायदा

याद रहे कि हमारी कैलेंडर कमेटी के विशेषज्ञ ईमानदार थे.

  • लेकिन उन्होंने हमें गलत बताया कि ईसाई कैलेंडर बेहतर है
  • क्योंकि वह विशेषज्ञ भी औपनिवेशिक शिक्षा के शिकार थे
  • और याद रहे कि औपनिवेशिक शिक्षा चर्च की शिक्षा है.
  • उसका काम ही है छुपे छुपे ईसाइयत फैलाना

खैर अभी गणित की बात हो रही है कैलेंडर की नहीं

  • कैलंडर केवल एक उदहारण था कि जो विशेषज्ञ औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली से सीखे हैं
  • उनकी बंद कमरे की बात मानना खतरनाक है.

तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बेहतर क्या है

  • हमारा प्राचीन गणित या औपनिवेशिक मैथमेटिक्स?

गणित बनाम मैथमेटिक्स

लोगों को अचरज होता है गणित और मैथमेटिक्स में फर्क क्या है?

  • कई सालों से इस पर बोल रहा हों और लिख रहा हूँ
  • और अब इस पर भारतीय उच्च अध्ययन संसथान में पूरी किताब लिख रहा हूं.
  • इस किताब का सारांश देखें http://ckraju.net/papers/presentations/abstract-2-iias.pdf.
  • छोटे से व्याख्यान में यह सब कुछ समझाना मुश्किल है

संक्षेप में एक उदाहरण के सहारे समझाता हूं

Angle शब्द का हिंदी अनुवाद क्या है?

  • सब कहेंगे “कोण”.
  • यह गलत है.

उभयनिष्ठ

  • अब हमारी छठी की एनसीईआरटी कि गणित की पाठ्यपुस्तक में कोण शब्द की परिभाषा देखें
  • उसमें एक शब्द आता है “उभयनिष्ठ”
  • यह शब्द हिंदी के किसी शब्दकोश में नहीं मिलता है.
  • (संस्कृत डिक्शनरी में भी नहीं मिलता है)

ज़ाहिर है कि यह शब्द “उभयनिष्ठ” कभी प्रयोग में था ही नहीं

  • अनुवादक ने इसका आविष्कार किया
  • आविष्कार की क्या ज़रुरत पड़ी?

क्या हमारे प्राचीन गणित में angle की कोई अवधारणा नहीं थी?

  • अवधारणा थी लेकिन अलग किस्म की.

Angle के लिए सही संस्कृत शब्द "चाप" है

  • जो वक्र रेखा से जुड़ा है
  • और यही शब्द 400 साल पहले तक हमारी परंपरा में इस्तेमाल होता था

वक्र रेखा

  • वक्र रेखा को नापने के लिए सुतली (या शुल्ब) जरूरी है
  • इसे कंपास बॉक्स के कोई भी उपकरण से नहीं नापा जा सकता
  • लेकिन आज हरेक विद्यार्थी के पास कंपास बॉक्स होता है.
  • जो ज्यामिति हम सिखाते हैं वह कंपास बॉक्स और सरल रेखा पर आधारित है शुल्ब सूत्र पर नहीं

याने की औपनिवेशिक शिक्षा ने हमारी गणित की शिक्षा बदल दी.

  • पहले हम रज्जू गणित पढ़ाते थे
  • अब नहीं

तो इस बदलाव से हमें फायदा हुआ या नुकसान?

  • अगर एक खेत है जिसकी मेढ टेढ़ी मेढ़ी है.
  • और हमें उसका क्षेत्रफल निकालना है.
  • तो हम रस्सी इस्तेमाल करेगे या कंपास बॉक्स?
  • (इसका क्षेत्रफल कैसे निकालना, इसकी विधि आर्यभट समझाता है हमारी स्कूली पाठ्य पुस्तक नहीं.)

व्यावहारिक

  • यह स्पष्ट है कि व्यावहारिक रूप से नुकसान हुआ
  • लेकिन भले ही हम शुल्ब सूत्र का महिमागान करें
  • हमारी पाठ्यपुस्तक कहती है कि शुल्ब सूत्र की ज्यामिति घटिया किस्म की थी
  • सिर्फ इसलिए कि वह व्यवहारिक थी

बंद कमरे में विशेषज्ञों ने यह निर्णय लिया

  • और वे विशेषज्ञ सार्वजनिक वाद विवाद से कतराते हैं
  • क्योंकि उनके पास सबूत का एक ही तरीका है (विकिपीडिया के समान)
  • पश्चिमी शब्द प्रमाण

गणित और मैथमेटिक्स में और बहुत सारे गहरे फर्क हैं, लेकिन एक मूल फर्क यह है

  • गणित व्यवहारिक है जबकि
  • मैथमेटिक्स मजहब से जुड़ा है

लोग चौंक जाते हैं. मजहब कहाँ से आ गया १+१=२ में?

थोड़ी देर में समझाऊँगा

संक्षेप में

  • मैथमेटिक्स शब्द की व्युत्पत्ति ही मजहब (mathesis) से जुड़ी है
  • मिस्त्र की रहस्यवादी ज्यामिति ने और अफलातून ने मैथमेटिक्स को मजहब से जोड़ा
  • इसको 2 मिनट में चेक कर सकते हैं,
  • प्राथमिक स्त्रोतों से

गूगल में अफलातून के "मैनो" नामक संवाद की खोज करें

  • Google: “Plato Meno”
  • MIT के Internet Classics archive पर जाएं
  • और Meno में soul (आत्मा)ढूंढे और तीसरी बार जहां पाया जाता है वहां देखें
  • की सुकरात गुलाम लड़के के ज्यामिति के सहज ज्ञान को आत्मा से और पुनर्जन्म से कैसे जोड़ता है

बाद में चर्च ने अपने प्रचार के जरिए इस फलसफा को तोड़ मरोड़ कर

  • मैथमेटिक्स को अपनी हठधर्मिता से दूसरी तरह से जोड़ा

इसे समझाने में थोडा वक्त लगेगा.

  • फिलहाल सिर्फ इतना कहूंगा कि यूक्लिड द्वारा कथित रूप से लिखी गई किताब को चर्च ने 700 साल से पाठ्यपुस्तक बना रखा था.
  • हमने कभी पूछा नहीं कि इससे चर्च का क्या फायदा हुआ?
  • और हमारा कुछ नुकसान हो सकता है क्या
  • खाली औपनिवेशिक विधि से शिक्षित विशेषज्ञों की बात मानते रहे

छुपी इसाइयत

  • कदाचित कैलंडर के सामान
  • चर्च की पाठ्य पुस्तक के साथ साथ चर्च के
  • कई ईसाई मिथक और अन्धविश्वास भी जुड़े हैं.

मिथक

  • पहले मिथक देखते है. यह् आसान है.
  • हमारी नवी की पाठ्यपुस्तक कहती है की हमारी प्राचीन ज्यामिति (शुल्ब सूत्र) की प्रणाली घटिया है
  • क्योंकि वह महज व्यवहारिक है

फिर सही क्या है?

  • नवीं कि पाठ्य पुस्तक आगे बताती है
  • ग्रीक ज्यामिति उत्तम है
  • क्योंकि वह तर्क और निगमन (deduction) पर आधारित है
  • और हमें उसकी नकल करना चाहिए.

  • उत्तमता का दावा सही है या गलत बाद में देखेंगे
  • पहले यह बात सच या झूट है इसका निर्णय कर लें.

  • तो वह कौन से ग्रीक थे जिन्होंने कथित उत्तम विधि से ज्यामिति करी?
  • यूक्लिड और पाइथागोरस का नाम आपने सुना होगा
  • यह हमारी नवी और दसवीं की पाठ्य पुस्तकों में कई बार दोहराया जाता है

  • लेकिन यह मिथक है या इतिहास?
  • अगर इतिहास है तो इसका कुछ सबूत होना चाहिए
  • पाइथागोरस के लिए तो कोई सबूत नहीं है यह सब मानते हैं
  • (पाइथागोरस के अनुयायी थे लेकिन पाइथागोरस स्वयं महज मिथक है)

यूक्लिड के बारे में क्या सबूत है?

  • जब मैंने पहले यह सवाल उठाया
  • तो सन 2002 में एक अग्रणी पश्चिमी ग्रीक इतिहासकार David Fowler ने मान लिया कि कोई सबूत नहीं है

"What is known at present about Euclid?"

"NOTHING"

David Fowler

2007 में एनसीईआरटी से पूछा तो उनका जवाब मिला सबूत की क्या जरूरत है हम तो कमेटी पर चलते हैं.

2010 में यूक्लिड के लिए प्राथमिक तथ्यों के आधार पर ठोस सबूत के लिए ₹2 लाख का इनाम घोषित किया

  • दस साल में कोई सामने नहीं आया
  • हाल ही में किसी ने एनसीईआरटी से पूछा यूक्लिड के लिए प्राथमिक तथ्यों से सबूत क्या है
  • एनसीईआरटी का लिखित जवाब आया कि कई पश्चिमी पुस्तकों में यूक्लिड का जिक्र है.
  • यही सबसे पक्का सबूत है!

यानी कि प्राथमिक तथ्यों की कोई जरूरत नहीं है

  • हमें झक मारकर पश्चिमी शब्द प्रमाण मानना होगा
  • क्योंकि यही औपनिवेशिक शिक्षा का सार है कि पश्चिम का कहा मानो और उसकी अंधी नक़ल करो.
  • और सरकार भी यही कहती है हम ना एक लाइन बदलेंगे
  • ना उसके बारे में सार्वजनिक रूप से सोचेंगे

युक्लिड मिथक है लेकिन चर्च का मिथक कैसे हैं?

  • यह मैं एक किताब Euclid and Jesus में विस्तार से समझा चुका हूं.
  • संक्षेप में चर्च ने कई सदियों तक "युक्लिड" की किताब को पाठ्य पुस्तक बना रखा था.
  • मिथक ज़रूरी था चर्च की पाठ्य पुस्तक बनने के लिए.

एक और आपत्ति कई बार जताई जाती है

  • युक्लिड हो न हो, जिस किताब का वह कथित लेखक है, वह किताब तो है.

लेकिन बात एक किताब के अस्तित्व की नहीं हो रही.

  • बात हो रही है कि कौन सा गणित बेहतर है.
  • हमारी नवीं कि पाठ्य पुस्तक कहती है कि हमारा गणित घाटिया था क्योंकि केवल ग्रीक लोगों ने निगमन पर आधारित सबूत दिए.
  • क्या यह सच है?

क्या जिस किताब का युक्लिड कथित लेखक था

  • उसमे निगमन पर आधारित सबूत हैं?
  • नहीं
  • पहले प्रमेय का भी नहीं, और
  • (आखिरी) पैथागोरस प्रमेय का भीं नहीं.

क्योकिं पैथागोरस प्रमेय के प्रमाण में चौथा प्रमेय ज़रूरी है जिसका भी निगमन पर आधारित प्रमाण नहीं.

  • पहले और चौथे प्रमेय के सबूत में प्रत्यक्ष प्रमाण आ जाता है.

हमारी सरकारी पाठ्य पुस्तक सरासर झूठ बोलती है.

  • कि ग्रीक लोगों ने निगमन (deduction) के आधार पर सबूत दिया.
  • यह बात पश्चिम में बरट्रांड रसेल १२० साल पहले से खुले आम कह चूका हैं.
  • "युक्लिड" की किताब में सिर्फ निगमन (pure deduction) के आधार पर सबूत नहीं पाए जाते
  • लेकिन अब बहाना बनाते हैं कि ऐसा "युक्लिड" का इरादा था.

जैन मत हमें बताता है कि इरादों के बारे में कुछ भी मनगढ़ंत कहा जा सकता है

  • तो इरादों कि बात में विश्वास न करे.
  • और मिथक वाले युक्लिड के इरादों के बारे में क्या?

  • (वैसे यह इरादों की बात पूरी तरह से झूठ है.
  • किताब की लेखिका का इरादा मिस्त्र की (या अफलातून) की रहस्यवादी ज्यामिति से जुड़ा था.)
  • ऐसा इसके भाष्यकार प्रोक्लुस स्पष्ट कह चुके हैं.

लेकिन ऐसे कई झूठ के सहारे हमारी गणित की शिक्षा पद्धति बदल दी गयी है.

  • और उसे चर्च की अपनाई पाठ्य पुस्तक से जोड़ दिया गया.
  • इससे व्यावहारिक नुक्सान होता है.
  • यह सब सिर्फ पश्चिमी शब्द प्रमाण के आधार पर होता है.
  • लेकिन इतने झूठों की ज़रुरत क्यों पड़ी?

अंतरिम सारांश

  • युक्लिड एक चर्च मिथक है. उसके अस्तित्व का कोई ठोस सबूत नहीं. सबूत के लिए २ लाख का इनाम अब भी जारी है.
  • "युक्लिड" की किताब में कोई निगमन पर आधारित सबूत नहीं है. हमारी पाठ्य पुस्तक झूठ के सहारे शुल्ब सूत्र की ज्यामिति को घटिया ठहराती है.
  • यह दोनों बातें विद्यार्थियों को मालूम होनी चाहिए.

अन्धविश्वास

  • ग्रीक लोगों में निगमन था या नहीं इस बात को अलग रखते हैं.
  • निगमन का क्या महत्व है? मैथमेटिक्स में क्यों इस्तेमाल करना चाहिए. यह उत्तम क्यूं है?

पहली बात तो निगमन (deduction) शब्द का सही अर्थ समझें.

  • जो हमारी पाठ्य पुस्तक छुपाती है.
  • हिंदी का मुखौटा पहना देने से विदेशी विचारधारा अपनी नहीं हो जाती
  • डिडक्शन सिर्फ तर्क की बात नहीं.

तर्क तो हिन्दुस्तानी परंपरा में भी पाया जाता है

  • असली अरस्तू के पहले से
  • जैसे कि आर्यभट ने कहा पृथ्वी गोल है, कदम्ब के फूल के समान.
  • उसने अंतरिक्ष जाकर पृथ्वी को प्रत्यक्ष नहीं देखा. अनुमान लगाया क्योंकि दूर के झाड दिखते नहीं है.
  • जहाज क्षितिज में विलीन हो जाता है, और क्षितिज गोलाकार है.

वैसे तो हिन्दुस्तानी परंपरा में पैथागोरस प्रमेय के सबूत भी पाए जाते हैं.

  • लेकिन उनमे तर्क के साथ साथ प्रत्यक्ष प्रमाण का भी उपयोग होता है.
  • (जैसे कि "युक्लिड" के सबूतों में भी होता है.)

तो इसमें खराबी क्या है?

  • प्रत्यक्ष प्रमाण में चूक हो सकती है.
  • यह सभी मानते है.
  • जैसे रस्सी को कोई साप समझ ले या सांप को रस्सी.

लेकिन फिर भी सभी हिंदुस्तानी फलसफे प्रत्यक्ष प्रमाण को पहला प्रमाण मानते हैं

  • न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्व-मीमांसा, अद्वैत वेदांत, बौद्ध, जैन. लोकायत
  • विज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण (experimental method) पर आधारित है.
  • क्योंकि यही सबसे विश्वसनीय प्रमाण है.

पश्चिमी (चर्च) मत में निगमन अचूक माना जाता है.

  • इसलिए उनका कहना है कि निगमन उत्तम है.
  • क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाण में चूक हो सकती है, इसलिए
  • "अचूक" रखने के लिए मैथमेटिक्स में प्रत्यक्ष प्रमाण वर्जित किया जाता है.

  • याने की मैथमेटिक्स हमारे सारे फलसफों को एक साथ नकार देता है.
  • गणित में प्रत्यक्ष प्रमाण मंज़ूर है.

लेकिन यह सोचना कि डिडक्शन (निगमन) अचूक है पूरी तरह से अंधविश्वास है.

  • निगमन अचूक नहीं. (Deduction is fallible.)

मैथमेटिक्स में कई गलत सबूत छप चुके हैं

  • “यूक्लिड” की किताब के पहले प्रमेय का प्रमाण निगमनात्मक मानना गलत है
  • लेकिन इस चूक को समझने में पश्चिमी दुनिया के सभी विद्वानों को 700 साल लग गए.
  • सभी पश्चिमी विद्वान छोटे से निगमन में सदियों तक चूक गए.

निगमन में यह चूक केवल अतीत की बात नहीं.

  • वर्तमान में बार बार देख सकते हैं.

शतरंज का खेल पूरी तरह से निगमन (deduction) पर आधारित है

  • बिना गलती के हार नहीं हो सकती
  • लेकिन हर एक इंसान शतरंज में हर बार गलती करता है
  • इसलिए हर बार कंप्यूटर से हारता है

वैसे भी लोकायत ने बताया की अनुमान में गलतियां हो सकती हैं (even valid deduction may lead to errors)

  • भेड़िए के पदचिन्ह की कहानी में गलत मान्यता से गलत निष्कर्ष निकलता है
  • अगर मान्यता (axioms, postulates) गलत हैं तो उनसे गलत निष्कर्ष निकलेगा.
  • पश्चिमी फलसफा भी यह बात मानता है लेकिन उसके सच को छुपाने के लिए प्रमेयों को "सापेक्ष सत्य" (relative truth) बोलता है

  • बगैर यह बताएं की कुछ भी बकवास सापेक्ष सत्य हो सकता है
  • सापेक्ष सत्य का मेरा जाना पहचाना उदाहरण है “हर एक खरगोश के दो सींग होते हैं”
  • वह कैसे? मान लें कि "हरेक जानवर के दो सींग होते हैं"!
  • गलत निष्कर्ष पर सही निगमन से आसानी से पहुँच सकते हैं.

हमें कैसे मालूम कि मैथमेटिक्स की शुरुआती मान्यताएं (axioms, postulates) सच है?

  • नहीं मालूम.
  • जैसे कि एक मान्यता (Hilbert's axiom) यह है “दो (अदृश्य) बिंदुओं के बीच एक ही (अदृश्य) सरल रेखा होती है”
  • अगर बिंदु दृश्य हैं तो यह गलत है. दो दृश्य बिन्दुओं को एक से अधिक रेखा से जोड़ा जा सकता है.

  • लेकिन अदृश्य बिंदु की बातें सिर्फ सब्द प्रमाण पर जान सकते हैं.

सच्चाई यह है कि

  • अदृश्य बिंदु के सामान
  • मैथमेटिक्स की सभी शुरूआती मान्यताए गैर भौतिक (non-physical, aka metaphysical)हैं.
  • इसलिए उनकी सच्चाई की परीक्षा करना असंभव है.

अगर निगमन का अचूक होना अन्धविश्वास है तो उसका क्या फायदा?

  • हमें कुछ फायदा नहीं.
  • विज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित है.
  • अगर हम मैथमेटिक्स विज्ञान के लिए करते हैं
  • तो प्रत्यक्ष के वर्जित होने से कोई फायदा नहीं.

चर्च का फायदा

  • लेकिन चर्च को फायदा ही फायदा है.
  • प्रत्यक्ष प्रमाण अगर मंज़ूर हो तो चर्च की सारी हठधर्मिता का खंडन हो जायेगा.
  • इसलिए चर्च ने प्रत्यक्ष के वर्जित होने का इतना गुणगान किया.

आश्चर्य की बात यह है कि आज़ादी के ७२ साल बाद भी

  • हम इस अन्धविश्वास को मानते चले आ रहे हैं
  • जो हमारे सारे फलसफे के खिलाफ है
  • और चर्च के इस प्रचार से जूझने से डरते है.

प्रत्यक्ष को वर्जित करने से ही मैथमेटिक्स कठिन हो जाता है.

मैथमेटिक्स के गैर भौतिक तत्व 1+1=2 को भी बहुत कठिन बना देता है.

तो अब शायद आप कुछ कुछ समझ गए होंगे कि चर्च मजहब कैसे मैथमेटिक्स में मिल जाता है (प्रत्यक्ष वर्जित कर)

  • और उससे १+१=२ में क्या फर्क पड़ता है.

तो अब क्या करें?

पहले तो बदलाव के डर की बात करें

औपनिवेशिक शिक्षा ने कई तरह से हमें अन्धविश्वासी और अज्ञानी बनाया

  • ऐसे में लोगों को डर लगता है
  • कि गणित की शिक्षा बदल देने से हमें घोर नुक्सान हो जायेगा
  • यह दो कारण से सच नहीं.

पहला कारण यह कि सभी व्यावहारिक उपयोगिता गणित की है मजहब से मिश्रित मैथमेटिक्स की नहीं.

  • किराने की दूकान में गैर भौतिक सबूत कोई काम का नहीं.
  • आज भी अगर चांद पर जाना है तो रॉकेट का प्रक्षेप पथ (trajectory) जानने के लिए गणित ही काम आता है मैथमेटिक्स नहीं.
  • इसलिए मैथमेटिक्स के मजहबी फलसफे को नकारने से कोई व्यावहारिक नुकसान नहीं.
  • जो कुछ भी कंप्यूटर पर होता है, वह वैसे ही होते जायेगा

दूसरी बात यह की

  • ज्यामिति को छोड़
  • लगभग सारा व्यावहारिक गणित यूरोप ने पहले हमसे लिया
  • साधारण अंकगणित से लेकर सांख्यिकी और कैलकुलस तक.
  • लेकिन यूरोप में चर्च के वर्चस्व के कारण उसे मजहबी मैथमेटिक्स में सम्मिलित किया

  • उपनिवेशवाद के दौरान हमारे ही गणित का फलसफा बदल के
  • उसे एक झूठे इतिहास के साथ मिलाया (जैसे कि "न्यूटन या लेइब्निज़ ने कैलकुलस की खोज की या आविष्कार किया")
  • यह मजहबी फलसफे और झूठे इतिहास का सारा पैकज हमें औपनिवेशिक शिक्षा के साथ लौटा दिया
  • हमने बगैर चेक किये सब मान लिया और आज भी कहते हैं कि इसकी न एक लाइन बदलेंगे न उसके बारे में सार्वजनिक रूप से सोचेंगे.

जो लोग कुछ करना चाहते हैं उनके लिए रास्ता साफ़ है.

  • पिछले दशक में मैंने शैक्षणिक प्रयोग कर
  • यह साबित किया है कि
  • कैलकुलस को आर्यभट की विधि से विश्वविद्यालय में
  • और ज्यामिति को शुल्ब सूत्र की विधि से स्कूल में पढाया जा सकता है.

कैलकुलस विज्ञान और टेक्नोलोजी के लिए बहुत ज़रूरी है.

  • १९९८-२००७ के बीच मैंने किताब तैयार करी
  • कि कैलकुलस सबसे पहले हिंदुस्तान में शुरू हुआ.
  • आर्यभट से
  • उसके अनुयायियों ने अगले हज़ार साल उसे आगे बढाया

१६वीं सदी में कोची के जेसुइट लोगों ने इसे अनुवाद कर यूरोप भेजा

लेकिन यूरोपीय अनंत श्रेढ़ी का योग निकालने की हिन्दुस्तानी विधि समझे नहीं

  • और बीसवीं सदी में गैर भौतिक limits ("सीमा")
  • और formal real numbers (गैर वास्तविक "वास्तविक संख्या") का आविष्कार किया.

इसे आज ११वीं और १२वीं में पढाया जाता है.

  • लेकिन बहुत कम लोग इसे अच्छे से जानते हैं.

Cape Town challenge

  • Prove 1+1=2 in formal REAL numbers (not integers or natural numbers)
  • from FIRST PRINCIPLES (in the manner of Russell and Whitehead)
  • WITHOUT assuming any result from AXIOMATIC SET THEORY.

यह चैलेंज आपके लिए नहीं है. हमारी बड़ी बड़ी संस्थाओं में मैथमेटिक्स के प्रोफेसर के लिए है.

लेकिन "लिमिट" की कोई व्यवहारिक उपयोगिता नहीं.

  • (वैसे आर्यभट के अनुयायी नीलकंठ ने १६वीं सदी में अनंत गुणोत्तर श्रेढ़ी (infinite geometric series) का बगैर लिमिट के योग निकाला.)
  • और "लिमिट" कैलकुलस को बहुत कठिन कर देती है.

इसलिए आर्यभट की संख्यात्मक विधि को

  • ब्रह्मगुप्त के अव्यक्त गणित (non-Archimedean arithmetic) से
  • और शून्यवाद (zeroism) के फलसफे से जोड़कर
  • मैंने पिछले एक दशक से दुनिया में कई जगह कैलकुलस सिखाया, सारनाथ, मलेशिया, ईरान, AUD, और SGT University, Delhi में.
  • इससे कैलकुलस एकदम सरल हो जाता

सरल होने से विद्यार्थी कठिन से कठिन सवाल हल कर सकता है.

  • जो कि साधारण कैलकुलस कोर्स में नहीं सिखाये जाते.
  • जैसे कि Jacobian elliptic functions
  • Ballistics with variable resistance, etc.
  • यह टुटोरिअल शीट देखें, प१, प२.

कैलकुलस को इस विधि से सीखने के लिए आवश्यकता पड़ती है शुल्ब सूत्र की ज्यामिति की

निष्कर्ष

  • हमारे पारंपरिक गणित का आज की तारीख में भी महत्व है
  • आर्यभट का कैलकुलस, और शुल्ब सूत्र कि ज्यामिति इस विधि से पढाई जा सकती है.
  • लेकिन पहले पश्चिमी पूर्व पक्ष के मैथमेटिक्स के उत्तम होने के दावे का खंडन करना ज़रूरी है.

निष्कर्ष (जारी)

  • आखिरी में सिर्फ यह कहूँगा
  • कि आज़ादी चाहते हैं तो खुद हासिल करनी पड़ेगी.
  • सरकार की नयी शिक्षा नीति पिछले सात साल से आ रही है, और भी कुछ साल लग सकते हैं.
  • और वह औपनिवेशिक शिक्षित "विशेषज्ञों" की बनायी होगी.

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