व्यावहारिक और सेक्युलर गणित पढ़ायें
चंद्रकांत राजू
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान
राष्ट्रपति निवास, शिमला
अनिवार्य विषय
- दसवीं तक गणित अनिवार्य विषय क्यों है?
- क्यों कि इसका सबके लिए व्यावहारिक महत्त्व है.
- किराने की दुकान में जाएं तो गणित की जरूरत पड़ती है.
- आगे चलकर विज्ञान, इंजीनियरिंग इत्यादि में गणित की बहुत जरूरत पड़ती है.
- और वे भी व्यवहारिक ज्ञान के विषय हैं.
- अनिवार्य विषय का सेक्युलर होना बहुत जरूरी है.
- क्योंकि हमारा संविधान कहता है कि हम सेक्यूलर हैं.
- अनिवार्य विषय द्वारा मजहब की तालीम देना गलत है.
- बहुत सारा गणित जो हम दसवीं तक सीखते हैं
- वह वाकई में व्यावहारिक हैं.
- और सच पूछा जाए तो वह व्यावहारिक इसलिए है
- कि वह हिंदुस्तानी मूल का है.
- जैसे कि अंकगणित.
- माया भी अंकगणित अच्छा करते थे.
- लेकिन यूरोप ने अंकगणित हिंदुस्तान से ही सीखा.
- हिंदुस्तानी अंकगणित ८वीं सदी बगदाद गया
- वहां अल ख्वारिज्मी ने उस पर हिसाब अल-हिन्द नाम की किताब लिखी,
- वहां से वह उमय्यद खिलाफत (अल-अन्दालुस, या मुसलमान यूरोप) पहुंचा.
- कुर्तबा (Cordoba) से उसका निर्यात क्रिस्तानी यूरोप में गर्बर्ट (पोप सिल्वेस्टर द्वितीय) ने किया (१० वीं सदी में).
- गर्बर्ट स्थान मूल्य प्रणाली तो समझा,
- लेकिन इससे जुडी हिंदुस्तानी अंकगणित की दक्षता नहीं समझ पाया.
- उसे गणित की घटिया विधि आती थी रोमन अंकों में अबेकस के साथ.
- तो उसने एक नए किस्म का अबेकस तैयार करवाया.
- उसने गलत माना कि अंकगणित के लिए अबेकस ज़रूरी है.
- याने कि उसने सोचा की अंको के आकार में ही कोई जादू है. - गर्बर्ट की इसी गलती से हिंदुस्तानी अंकगणित का नाम "अरबी अंक" पड़ गया.
- मेरा जोर "अरबी" शब्द पर नहीं है, जो कि यूरोप के लिए स्वाभाविक था,
- (और इस पर हिन्दू-अरबी बहस करना मूर्खता है, क्योंकिँ अंकों के आकर से कोई फर्क नहीं पड़ता, बात अंकगणित कि विधि कि हो रही है)
- मैं कह रहा हूँ की तब यूरोपीय प्रारंभिक अंकगणित भी ठीक से नहीं समझे.
- क्योंकि अबेकस विधि से हिन्दुस्तानी अंकगणित की दक्षता नष्ट हो जाती है.
- अगर बात आपके समझ में नहीं आई तो \(1788 \times 1879\) करें रोमन अंकगणित की विधि से.
- यह सवाल कोई भी बच्चा आज दो मिनट में कर सकता है.
- लेकिन अगर आप ने इसे अगले एक घंटे में कर लिया तो ५००० रुपये का इनाम दूंगा.
- याद रहे केवल उत्तर रोमन अंकों में नहीं लिखना है,
- उत्तर रोमन अंकगणित की विधि से निकालना है.
- 13 वी सदी में हिन्दुस्तानी अंकगणित दोबारा (क्रिस्तानी) यूरोप गया.
- फिबोनाच्ची ने अफ्रीका में अल ख्वारिज्मी का हिसाब अल हिंद सीखा और उसका लातिनी अनुवाद किया.
- वह एक व्यापारी था और व्यापार में फायदे के लिए दक्ष अंकगणित (efficient arithmetic) का तुलनात्मक लाभ (comparative advantage) समझा
- याने कि कुछ व्यापारियों ने हिन्दुस्तानी गणित का व्यावहारिक लाभ समझा.
- लेकिन फ्लोरेंस के लोगों को जीरो से बहुत कठिनाई हुई
- और उन्होंने जीरो के खिलाफ कानून पारित किया सन १३०० में.
- क्योंकि सारा विज्ञान का इतिहास हम आज भी पश्चिमी स्त्रोतों से सीखते हैं
- इसलिए हम जीरो और अरबी अंकों की कहानी दोहराते जाते हैं.
- असली कहानी यह है कि क्रिस्तानी यूरोप अंकगणित में पिछड़ा था.
- और हम से ही प्रारंभिक अंकगणित की दक्ष विधि सीखी उसके व्यावहारिक लाभ के लिए.
- 16 वीं शताब्दी में यूरोप ने फिर से तीसरी बार हिंदुस्तानी अंकगणित का आयात किया (कोची से)
- और उसे व्यावहारिक गणित के नाम से सिखाना चालू किया (१५७२ के आस पास से)
- इस तरह यूरोपीय लोगों को हिन्दुस्तानी अंकगणित सीखने और समझने में ६०० साल से ज्यादा लग गए.
- कुछ ऐसी ही कहानी अलजेब्रा (अल ख्वारिज्मी के "अल जब्र वाल मुकाबला" से),
- वृत्तमिती (त्रिकोणमिति नहीं),
- कैलकुलस, और
- सांख्यिकी की है.
- लेकिन इस सब को समझाने में वक्त लगेगा, तो इन बातों में आज नहीं जाऊंगा.
- कैलकुलस पर मेरा MIT विडियो देख लें.
- सांख्यिकी पर मेरा JNU विडियो देख लें.
- ये विषय स्कूल में अधूरे तरीके से पढाये जाते हैं,
- इसलिए ज्यादातर लोगों को कठिन लगते हैं.
- आज मैं स्कूल गणित में भी आसान गणित पर सीमित रहूँगा.
- खैर मैं आज के विषय पर सीमित रहना चाहूँगा.
- आज बात इसकी नहीं हो रही कि हिन्दुस्तानी गणित बेहतर है या यूरोपीय मैथमेटिक्स.
- आज बात इसकी हो रही है कि गणित और मैथमेटिक्स में कौन सा व्यावहारिक और सेक्युलर है
- और उसे कैसे और क्यूं पढ़ायें.
- पहले हम समझ लें कि आज जो मैथमेटिक्स पढाया जा रहा है वो सेक्युलर है या नहीं.
- १+१=२ में कैसे मज़हब घुस जाता है, इसे इस विडियो में देख लीजिये.
- (यही Cape Town challenge JNU विडियो में भी है, JNU के प्राध्यापकों के लिए भी चैलेंज दिया).
- किसीका भी जवाब नहीं आया क्योंकि १+१=२ का सबूत भी बहुत कठिन है (“वास्तविक" संख्या में, पूर्णांक में इतना नहीं).
- लोगों को आश्चर्य होता है कि मैथमेटिक्स में मजहब कैसे घुस गया?
- दरअसल हिन्दुस्तानी गणित हमेशा व्यावहारिक रहा है.
- लेकिन इसके विपरीत, पश्चिमी मैथमेटिक्स शुरू से (पैथागोरस के कथित जमाने से ही) मजहब से जुड़ा है.
- किसी अल्प शिक्षित संस्कृत पंडित ने "मैथमेटिक्स" शब्द का गलत अनुवाद "गणित" कर दिया और यह प्रचलित हो गया.
- दरअसल मैथमेटिक्स शब्द की व्युत्पत्ति ही मजहब से जुड़ी है.
- मैथमेटिक्स कि व्युत्पत्ति माथेसिस से है.
- (विकिपीडिया झूठी व्युत्पत्ति देता है.)
- यह बात अफलातून ठोक ठोक के समझाता है कि मैथमेटिक्स आत्मा से जुड़ा है.
- अपने संवाद मेनो में यह समझाता है की हमारा मैथमेटिक्स का आंतरिक ज्ञान आत्मा के पिछले जन्मों मैं पाए ज्ञान के कारण है.
- हमारा देश गणतंत्र (Republic) कहलाता है. यह नाम अफलातून के संवाद रिपब्लिक से जुड़ा है.
- रिपब्लिक की शिक्षा नीति क्या है?
- इस संवाद में अफलातून स्पष्ट रूप से कहता है कि मैथमेटिक्स व्यावहारिक लाभ के लिए नहीं पढ़ाना चाहिए.
- इसे आत्मा जागृत करने के लिए पढ़ाना चाहिए.
- वैसे कुछ इसी अंदाज़ में हमारी पाठ्य पुस्तक भी व्यावहारिक ज्यामिति को नीचा बताती है.
- याने कि पश्चिमी मैथमेटिक्स शुरू से ही मजहब से जुड़ा है.
- यह बात अब खुद प्राथमिक स्त्रोतों से तुरंत जांच कर सकते हैं.
- अगर यह नहीं पता था तो आपकी शिक्षा अधूरी रह गयी.
- अफलातून कि सोच मिस्त्र कि रहस्यवादी ज्यामिति से जुडी थी.
- यही सोच अफलातून के ८०० साल बाद भी मिलती है.
- प्रोक्लुस कहता है Pythagoreans की भी यही सोच थी.
- यह हमें "यूक्लिड" की किताब पर प्रोक्लुस के भाष्य में मिलता है.
- आत्मा की जो परिकल्पना मिस्त्र और अफलातून की थी वह
- उपनिषद में (हिन्दुओं में) आत्मन की परिकल्पना के बहुत करीब है
- यही परिकल्पना शुरुआती ईसाई धर्म में भी पाई जाती है.
- बाद में इस पर दुनिया का पहला मजहबी जंग हुआ जो चर्च जीता.
- तो असली सवाल हमें यह पूछना चाहिए कि यह पश्चिमी मैथमेटिक्स कभी सेक्युलर और व्यावहारिक हुआ क्या?
- अगर हुआ तो कब?
- (यह तो हमने एक झलक देख ली कि पश्चिमी मैथमेटिक्स में व्यावहारिकता हिंदुस्तानी गणित से आई.)
- तो चर्च ने क्या किया मैथमेटिक्स से साथ?
- पश्चिमी शिक्षा प्रणाली पर चर्च का एकाधिकार था ६ठी सदी से.
- केवल ,मिशन स्कूल ही नहीं ऑक्सफ़ोर्ड, कैंब्रिज, पेरिस जैसे सभी बड़े विश्वविद्यालय चर्च ने खड़े किये
- और पूरी तरह उनका नियंत्रण किया.
- उदहारण के लिए पेरिस विश्वविद्यालय के लिए पोप ग्रेगोरी ९ का १२३१ का फरमान देखिए.
- ब्रिटेन में 1871 में पहली बार सेक्यूलर शिक्षा देने के लिए संसद में बिल पारित हुआ.
- और वह केवल प्राइमरी स्कूल के लिए था.
- तब तक हमारे यहाँ उपनिवेशवादी उच्च शिक्षा भी आ चुकी थी.
- जो पश्चिमी शिक्षा (याने चर्च कि शिक्षा थी).
- तो क्या वह सेक्युलर थी? क्या उसका मैथमेटिक्स भी सेक्युलर था?
- यह शिक्षा प्रणाली चर्च के फायदे के लिए बनी थी ना कि हमारे फायदे के लिए.
- लोग गलत सोचते हैं कि चर्च सिर्फ धर्म परिवर्तन करना चाहता है.
- चर्च का मूल उद्देश्य धर्म नहीं सत्ता रहा है, पांचवीं सदी से.
- इसलिए चर्च का मुद्दा वशीकरण है.
- अगर दूसरों को किसी और तरह से बेवकूफ बना कर वशीकरण किया जा सकता है तो वह चर्च को मंजूर है.
- याने चर्च का फायदा मतारोपण या मत शिक्षा (indoctrination) से है,
- जिससे बहुत सारे हम-जैसे लोग बेवकूफ बन जाएँ
- और चर्च के वश में आ जाएँ
- इसलिए उपनिवेशवाद के दौरान चर्च ने हमारी शिक्षा प्रणाली हडप ली.
- तो उपनिवेशवादी/चर्च शिक्षा ने मैथमेटिक्स में क्या परिवर्तन किया?
- जैसे मैंने कहा आज सिर्फ आसान चीजों की बात करेंगे. (कैल्कुलस और सांख्यिकी इस्त्यादी की नहीं)
- एक ख़ास बदलाव ज्यामिति में आया.
बदलाव स्पष्ट है
- पहले हम शुल्ब सूत्र की विधि से या रज्जू गणित की विधि से ज्यामिति पढ़ाया करते थे,
- औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के बाद हम ज्यामिति अन्य विधि से पढ़ाने लगे.
- यह तो स्पष्ट है कि रज्जू की जगह कम्पास बॉक्स का इस्तेमाल करते हैं.
- औपनिवेशिक ज्यामिति को यूक्लिड की ज्यामिति कहा जाता है.
- लेकिन इस ज्यामिति को चर्च ने १२वी सदी से क्यों अपनाया?
- युक्लिड कि किताब को चर्च ने अपनी पाठ्य पुस्तक क्यों बनाया लगभग ८ सदियों तक?
- मजहबी जंग(क्रुसेड) के समय की चर्च की पाठ्य पुस्तक क्या सेक्युलर या व्यावहारिक हो सकती है?
- हमने कभी सवाल नहीं उठाया. (सवाल न उठाना चर्च के वशीकरण का उदहारण है.)
- चर्च का क्या फायदा था युक्लिड की किताब को पाठ्य पुस्तक बनाने में?
- और ज्यामिति पढ़ाने की विधि बदलने से हमारा क्या व्यावहारिक फायदा हुआ?
- पहले चर्च के प्रचार की सरल (और सेक्युलर) विधि समझें.
- कहता है: "हम श्रेष्ठ है
- "हम श्रेष्ठ है" साबित करने के लिए चर्च ५वी सदी से ढेर सारा झूठा इतिहास गढ़ रहा है.
- चर्च के वश में आये लोगों का ख़ास लक्षण यह है कि
- वे खुद इस झूठे इतिहास को तथ्यों से चेक नहीं करेंगे,
- एक कहानी के सबूत के लिए सिर्फ दूसरी कहानी पेश करेंगे.
- जैसे कि हम हिन्दुस्तानी.
- यही विधि हमारी ९वी की गणित की पाठ्य पुस्तक में पायी जाती है.
- "पश्चिमी ज्यामिति श्रेष्ठ है, बाकी सारी दुनिया की घटिया है, पश्चिम की नकल करो"
- और इसे ग्रीक ज्यामिति के झूठे इतिहास से जोड़ दिया जाता है.
- हिन्दुस्तानी (और अन्य) ज्यामिति घटिया क्यों है.
- क्योंकि वह महज व्यावहारिक थी. 🤣🤣
- ऐसा हमारी ९वीं की पाठ्य पुस्तक कहती है.
- अफलातून की बात दोहराई जा रही है? हम गणित किस कारण से पढ़ते हैं?
- अब चलते हैं ९वी की गणित की पाठ्य पुस्तक देखते है.
- इसमें पहले तो “युक्लिड” की परिभाषा दी है कि
- “बिंदु वह है जिसका कोई भाग नहीं.”
- उसी पृष्ठ में नीचे बताया गया है कि यह परिभाषा गलत है. क्यों?
- क्योंकि इस परिभाषा में एक और शब्द जोड़ दिया है "भाग".
- “भाग” शब्द की परिभाषा क्या है?
- मान लो हम कहते हैं की बिंदु का कोई क्षेत्रफल नहीं है.
- तो फिर सवाल उठेगा क्षेत्रफल क्या है? (जसकी परिभाषा करने के लिए बिदु जरूरी है) इत्यादि.
- इसलिए पाठ्य पुस्तक का कहना है कि कुछ शब्दों को अपरिभाषित रहना जरूरी.
- यही पश्चिमी मैथमेटिक्स (औपचारिक गणित) में किया जाता है
- (और हमें उसकीं अंधी नक़ल करना चाहिए).
- अब चलिए NCERT से बगावत कर अपना दिमाग खुद लगाते हैं.
- “कुत्ते शब्द की परिभाषा क्या है?
- कभी आपको बचपन में किसी ने “कुत्ते” शब्द की परिभाषा दी क्या?
- जैसे कि एक कुत्ते के चार टांग एक पूँछ दो आंखें दो कान होते हैं?
- कुत्ते और बिल्ली में फर्क क्या है किसी ने समझाया? और अगर कुत्ते की एक टांग गई तो क्या वह कुत्ता नहीं बचा?
- असल में पाठ्य पुस्तक गलत तर्क देकर बच्चों को बहका रही है.
- कुत्ता क्या है? आप सब समझते हैं.
- क्योंकि कुत्ते की परिभाषा शब्दों में नहीं की जाती.
- सांकेतिक रूप से की जाती है (ostensive definition).
- प्रत्यक्ष प्रदर्शन कर की जाती है“ "देखो बच्चे यह कुत्ता है, यह बिल्ली है यह हाथी है” इत्यादि.
- सभी के 4 टांग दो कान और दो आंखें और एक पूछ होती है. उसके सहारे परिभाषा नहीं की जाती.
- तो प्रत्यक्ष प्रदर्शन कर बिंदु की परिभाषा क्यों नहीं?
- “देखो बच्चे यह बिंदु है”
- क्योंकि बच्चों से अहम बात छुपाई जा रही है.
- वह यह है कि मैथमेटिक्स में प्रत्यक्ष वर्जित है.
- बिंदु अदृश्य है.
- प्रत्यक्ष वर्जित करने से यह ज्यामिति श्रेष्ठ कैसे हो गई?"
- व्यवहारिक फायदा तो नहीं है. यह बात तो पक्की है.
- आपने कभी दो अदृश्य बिंदुओं के बीच कभी व्यावाहार में दूरी निकाली है क्या? निकाल सकते हैं क्या?
- नही. व्यवहार में बिंदु दृश्य होना जरूरी है. अदृश्य बिंदुओं का कोई व्यावहारिक फायदा नहीं है.
- फिर क्या फायदा है, और किसको?
- परिभाषा के लिए बिंदु अद्रश्य है, व्यावहार के लिए दृश्य है.
- क्या यही श्रेष्ठता है इस ज्यामिति की?
- हाँ! हमारे लिए कोई फायदा नहीं, लेकिन चर्च के लिए फायदा ही फायदा है.
- परिभाषा के लिए बिंदु को अदृश्य बनाना क्यों ज़रूरी है?
- क्योकि यह प्रत्यक्ष वर्जित होने का पाठ सिखाता है.
- इसका चर्च के लिए फायदा स्पष्ट है.
- अगर प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं तो तथ्य नहीं. तथ्य ही चर्च कि हटधर्मिता के खिलाफ हैं.
- यह भी याद रहे कि सभी हिन्दुस्तानी फलसफे
- (मीमंसा, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, अद्वैत वेदांत, बौद्ध, जैन, लोकायत)
- प्रत्यक्ष को पहला प्रमाण मानते है.
- तो प्रत्यक्ष वर्जित करने से सभी को एक वार में घटिया करार दिया जाता है.
- चर्च का झगडा तथ्य से है तर्क से नहीं.
- प्रत्यक्ष वर्जित करना चर्च की चाल थी जो हम आज तक नहीं समझे.
- १२वीं सदी में चर्च मुसलामानों का धर्म परिवर्तन करना चाहता था. क्रुसेड के दौरान.
- लेकिन न बल से कर पाया न बाइबिल से.
- इसलिए जबरन तर्क अपनाया क्योंकि मुसलमान (खास कर उस ज़माने में) तर्क मानते थे, जैसे कि अक्ल-इ-कलाम में.
- इस्लाम से नक़ल कर चर्च ने "क्रिस्तानी तार्किक धर्मशास्त्र" (Christian rational theology) को खड़ा किया.
- इस के लिए अरबी ग्रंथों का अनुवाद कर अरस्तू (इब्न रोश्द, Averroes) और यूक्लिड की पुस्तकों से
- अपने पादरियों को तर्क सिखाने की प्रथा चालू करी.
- इस्लाम से नक़ल की बात छुपाने के लिए इसका श्रेय ग्रीक को दिया.
- तभी से पश्चिम में तर्क का गुणगान होना शुरू हुआ.
- हमारे तर्कवादी (rationalists) गलत सोचते हैं कि तर्क अन्धविश्वास और मजहब के खिलाफ है.
- वे तथ्य-रहित तर्क (reason minus facts= formal reason)
- और तथ्य-सहित तर्क (reason plus facts = normal reason)
- के बीच में फर्क समझे नहीं.
- और इसलिए हमारी पाठ्य पुस्तक भी प्रत्यक्ष प्रमाण को वर्जित करने की बात को छुपाती है,
- जिससे यह भ्रान्ति बनी रहे कि तर्क शब्द का एक ही अर्थ है,
- दो विपरीत अर्थ नहीं
- कुछ तो खासियत है, यह बताने के लिए इस का नाम निगमन रख दिया.
- तथ्य-रहित तर्क या निगमन (pure deduction) के आधार पर कुछ भी बकवास सिद्ध किया जा सकता है.
- जैसे कि क्रिस्तानी धर्मशास्त्री एक्विनास ने तथ्य-रहित तर्क के आधार पर सिद्ध किया कि
- कई एंजेल एक कील के सर पर बैठ सकते हैं.
- यह अन्धविश्वास तर्क पर आधारित है.
- चर्च कि सत्ता अंधविश्वास पर आधारित है.
- और तथ्य-रहित तर्क अंधविश्वास के अनुकूल है.
- इसलिए श्रेष्ठ बताया जाता है.
- संक्षेप में, प्रत्यक्ष वर्जित करने से चर्च का फायदा है हमारा नहीं.
- चलिए दुबारा वापस आते हैं पाठ्यपुस्तक पर. इस अध्याय का शीर्षक है युक्लिड कि ज्यामिति.
- आप लोगों ने सुना होगा कि मैं 20 साल से कह रहा हूं कि यूक्लिड का अस्तित्व नहीं है.
- और ठोस सबूत के लिए दो लाख इनाम देने का दस साल पहले ऐलान कर चूका हूँ.
- कई लोग बड़े शान से जवाब देते हैं की यूक्लिड का अस्तित्व नहीं तो क्या हुआ, उसकी किताब तो है.
- कहने का मतलब यह कि आप कितने बेवकूफ हो, यह बात सोची नहीं.
- यह बात बीस साल से लगातार सुन रह हूँ.
- हां किताब है. लेकिन ना उन्होंने ठीक से पढ़ी है ना आप ने.
- वास्तविकता यह है, कि उसमे कोई विशेष तरह के सबूत नहीं है.
- वह किताब प्रत्यक्ष प्रमाण को वर्जित नहीं करती है.
- हमारी पाठ्य पुस्तक सिर्फ चर्च के झूठे प्रचार को दोहराती है.
- यह अंधविश्वास पश्चिम में भी ७०० साल तक फैला रहा.
- “यूक्लिड” की किताब का पहला ही प्रमेय देखें.
- यह है एक रेखाखंड पर समभुज त्रिभुज खड़ा करना.
- यह करने के लिए हम कंपास से रेखा खंड की लम्बाई नाप कर, दो चाप बनाते हैं.
- जिस बिंदु पर वे चाप एक दूसरे को काटते हैं उसे रेखाखंड के दोनों छोर से जोड़ देते हैं.
- यह समभुज त्रिभुज बना.
- लेकिन हमें कैसे मालूम कि दो चाप एक दूसरे को काटते हैं?
- यह तो साफ नजर आता है, याने कि प्रत्यक्ष प्रमाण है, जो वर्जित है.
- तथ्य रहित मैथमेटिक्स में सब सबूत किसी परिकल्पना (axiom = postulate) से शुरू होता है.
- (axiom "स्वयंसिद्ध" नहीं. पाठ्य पुस्तक ही देख लें.)
- यूक्लिड के किताब में तो ऐसी कोई परिकल्पना नहीं है जिससे दो चाप प्रतिच्छेदी हैं यह सिद्ध हो सके.
- यह बात समझने में पश्चिम को ७०० साल लगे.
- कई बार ऐसा कहा जाता है कि पैथागोरस प्रमेय नाम उचित है
- क्योंकि पैथागोरस ने इस प्रमेय का विशेष (तथ्य-रहित) सबूत दिया.
- यह भी महज अंधविश्वास है.
- न पाइथागोरस का कोई अस्तित्व, न कहीं ऐसा सबूत मिलता है २०वी सदी के पहले.
- "युक्लिड" की किताब में पाइथागोरस प्रमेय का सबूत प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित है.
- पाइथागोरस प्रमेय का सबूत चौथे प्रमेय पर आधारित है
- जिसका सबूत प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित है.
- और युक्लिड तो मिथक है ही.
- युक्लिड के लिए कोई ठोस सबूत नहीं, मेरे दो लाख के इनाम के बावजूद.
- NCERT का कहना है (कि चर्च के प्रचार से) युकिल्ड की बात १० पश्चिमी पुस्तकों में पायी जाती है तो प्राथमिक स्त्रोतों की कोई ज़रुरत नहीं.
- क्योकि हमारी शिक्षा प्रणाली चर्च के वश में है, और बगैर सबूत के पश्चिमी किताबों की बात मानना हिन्दुस्तानी छात्रों के लिए अनिवार्य है
- तो न युक्लिड था न उसकी किताब में कोई विशेष किस्म के सबूत है.
- बल्कि युक्लिड की किताब अफलातून के मजहबी मैथमेटिक्स के ढांचे में फिट बैठती है.
- यह इस किताब का भाष्यकार प्रोक्लुस तो कहता ही है.
- इस किताब में कई आकृतियाँ (diagrams)मिलती हैं,
- जो अफलातून के मज़हबी मैथमेटिक्स के ढांचे में बैठती हैं. (Phaedo).
- मैं युक्लिड कि बात इतना ठोक ठोक कर क्यों बोल रहा हूँ?
- क्योंकि अगर युकिल्ड को हटा दें तो चर्च का हाथ साफ़ नजर आता है कि
- चर्च ने किताब को अपनी सुविधा अनुसार तोड़-मरोड़ कर पुनर्व्याख्या करी.
- तो इस अध्याय का शीर्षक बदल दे: चर्च की ज्यामिति का परिचय.
- (फिर तो हम पढ़ा नहीं पाएंगे उसे क्योंकि वह सेक्युलर नहीं.)
- आखिर बच क्या जाता है?
- चर्च-प्रेरित अन्धविश्वास कि तथ्य-रहित तर्क (जो चर्च ने अपनाया) श्रेष्ठ है क्योंकि अचूक है. (superstition that deduction is infallible).
- अगर अचूक है तो इतने सारे विद्यार्थी मैथमेटिक्स में फैल क्यूं होते है? 🤣🤣🤣
- तो हम कैसे जानते हैं कि निगमन सही है?
- ज्यादातर हम किसी अधिकृत विद्वान की बात मानते है.
- वैसे तो बड़े बड़े विद्वान भी चूक करते हैं, जैसे कि Riemann, या कोसाम्बी.
- लेकिन इसमें राजनीति आ जाती है. यह अधिकृत विद्वान पश्चिमी हैं या पश्चिम द्वारा अधिकृत हैं.
- मैथमेटिक्स की प्रारंभिक परिकल्पना की जांच होने असंभव है क्योंकि वह यथार्थ नहीं (जैसे कि अद्रश्य बिंदु, अनंत रेखा इत्यादि)
- वैसे भी लोकायत हमें बता चूका है कि परिकल्पना गलत होने से अनुमान (निगमन) गलत हो सकता है. जैसे पाइथागोरस प्रमेय.
- और जो यथार्थ नहीं उसके बारे में कुछ भी बकवास परिकल्पना हो सकती है,
- और उससे बकवास निष्कर्ष निकाला जा सकता है, जैसे कि हर खरगोश के दो सींग होते हैं.
- वैसे कुछ परिकल्पनाओं में मज़हबी पक्षपात हो सकता है. (इस सब में नहीं जाऊँगा).
- क्या कोई विकल्प है?
- हाँ है.
- ज्यामिति, कल्कुलस, सांख्यिकी सभी में विकल्प तैयार किये हैं.
- और उन्हें सफलता पूर्वक पढाया है.
- लेकिन हम इतने चर्च के वश में आ चुके है कि
- नवी के गणित के बारे में भी
- कोई और पढ़कर विषय पर बोलने के लिए तैयार नहीं.
- बहुत कम लोगों में इतनी हिम्मत है कि शिक्षा में चर्च के अंधविश्वासों से छुटकारे की बात सोचें भी.
- और जो मेरी बात नहीं मानते हैं वो सार्वजनिक बहस के लिए भी तैयार नहीं
- जब भारतीय धरोहर ने मेरा सम्मान किया
- तब मैंने उप-शिक्षा मंत्री से कहा कि ७० साल में कौनसा गणित बेहतर इस पर कभी एक सार्वजनिक बहस भी नहीं हुई.
- कमसे कम एक दिन की बहस करवा दें. नहीं हो पायी.
- जब सोचने के बारे में भी इतना डर है
- नीचे से ऊपर तक
- तो स्वाभाविक है कि हम चर्च के गुलाम बने रहेंगे.
- ये आपके और आप के बच्चों की मानसिक आज़ादी की बात है.
- इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है.
- आपको गुलाम बने रहना है तो शौक से बने रहो.
- इस बारे में आप कुछ कर सकते हैं तो बताएं.
- याद रहे कि मैं चंद दिनों का मेहमान हूँ.