वंशवादी शासकों का इतिहास या विज्ञान और कला का इतिहास?
चंद्रकान्त राजू
विषयसूची
पिछले 3 सालों से आप लोगों की मांग रही है कि मैं हिंदी में बोलूँ.
आप मैं कई लोग जानते होंगे कि मैथमेटिक्स और साइंस अक्सर मेरे विषय होते हैं.
दूसरी जटिलता यह है की गणित के विपरीत मैथमेटिक्स में संख्या 1 की कोई सामान्य अवधारणा नहीं है.
अब यही सवाल बाल बुद्ध से किया गया, जब सिद्धार्थ की शादी यशोधरा से होने वाली थी.
लेकिन उसके पहले यह समझा दूँ कि इसका आज के विषय से क्या सम्बन्ध है.
दूसरी बात यह है कि केवल इतिहास और विज्ञान जानना काफ़ी नहीं है,
अब यह सब जान कर क्या फायदा होगा? आज की तारीख में?
क्योंकि आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे है, इस लिए यह बात भी समझा दूँ.
खाली एक बात बता दूँ: मैकोले को दोष देना सरासर गलत है,
आखरी बात यह बता दूँ. विज्ञान के इतिहास का आर्य नस्ल की ऊटपटांग कल्पना से क्या सबंध है,
संस्कृत और फ़ारसी और ग्रीक में समानता कोई आश्चर्य कि बात नहीं
पिछले 3 सालों से आप लोगों की मांग रही है कि मैं हिंदी में बोलूँ
इसलिए आज हिंदी में बोलूँगा.
वैसे हिंदी ना ही मेरी मातृभाषा है ना ही मेरी पित्रभाषा है.
लेकिन आए तो हैं बातचीत के लिए, तो बात तो समझना चाहिए भले ही उसे माने या ना माने.
आप मैं कई लोग जानते होंगे कि मैथमेटिक्स और साइंस अक्सर मेरे विषय होते हैं
अब दिक्कत यह है की इन विषयों में हिंदी की शब्दावली सही नहीं है.
खास तौर से आज़ादी के बाद बहुत सारे जो हमने अनुवाद किए वह गलत है.
उदाहरण के लिए मैथमेटिक्स शब्द ही ले लीजिए. इसका हिंदी अनुवाद गणित माना जाता है.
यह सरासर गलत है. क्यों?
क्योंकि मैथमेटिक्स में प्रत्यक्ष प्रमाण वर्जित है जबकि गणित में वह मान्य है.
इस विषय पर हिंदी में मेरा एक लंबा लेख है: “गणित बनाम मैथमेटिक्स” जो कि शिमला के उच्च अध्ययन संस्थान के जर्नल हिमांजलि में छपा.
मेरे वेबसाइट से मिल जायेगा.
संक्षेप में आपको समझा दूँ कि क्या फर्क पड़ता है
जैसे एक और एक दो होते हैं, इसका सबूत क्या है?
गणित में हम प्रत्यक्ष दिखा सकते हैं कि एक गिलास और एक गिलास दो गिलास बनते हैं.
लेकिन यह मैथमेटिक्स में नहीं चलता क्योंकि मैथमेटिक्स में प्रत्यक्ष वर्जित है.
किसी परिकल्पना से शुरुआत करना जरूरी है. (याने की axiom जिसका अक्सर गलत अनुवाद स्वयंसिद्ध होता है.)
अब आप समझ रहे हैं कि हिंदी बोलने में क्या तकलीफ है:
हरेक शब्द के साथ यह टिप्पणी जोडना पड़ती है कि यह शब्द गलत है.)
खैर हिंदी छोड़ मैथमेटिक्स पर वापस आते हैं
Axiom से १+१=२ सिद्ध करने का काम आसान नहीं है.
एक और एक दो होते हैं यह साबित करने के लिए बट्रेंड रसैल को 378 पेज लगे.
दूसरी जटिलता यह है की गणित के विपरीत मैथमेटिक्स में संख्या 1 की कोई सामान्य अवधारणा नहीं है
Natural number 1 के लिए Peano के axioms लगते हैं, जबकि real number 1 के लिए सेट थ्योरी के axioms लगते हैं.
खैर एक और एक दो का मामला काफ़ी पेचीदा है real numbers में,
हालांकि real numbers को वास्तविक संख्या कहकर नवी कक्षा में पढ़ाया जाता है (लेकिन वह एकदम गैर वास्तविक है).
क्योंकि मामला पेचीदा हो जाता है इसलिए मैंने जेएनयू मैं 1+1= 2 साबित करने के लिए 10,00,000 के इनाम का एलान किया.
खुद ही देख ले इसका विडियो यूट्यूब पर है
और यह जेएनयू के पूर्व वाइस चांसलर जो कि आजकल यूजीसी के चेयरपर्सन है उनके सामने हुआ.
कुछ सालों से आप से बात कर मेरे समझ में आ गया है की आप में से बहुतों ने शायद ही नवी की मैथमेटिक्स की किताब ध्यान से पढ़ी है.
इसलिए इन बातों को छोड़ देते हैं.
लेकिन आप लोगों ने सभी ने गिनती तो सीखी होगी?
सवाल पूछ रहा हूं सीखी है या नहीं?
कृपया जवाब दे दे.
माफ करें मैं हर बात की परीक्षा लेना चाहता हूं.
तो छोटा सा सवाल आपसे कर दूँ. सिर्फ गिनती के बारे में.
100 करोड़ से आगे की संख्याओं के क्या नाम है यह बता दें.
हिंदी में बताएं: यह million, billion, trillion, नहीं चाहिए,
और नाम चाहिए ऐसा नहीं जैसे हमारे अन पढ़ पत्रकार लिखते हैं “हज़ार करोड़” “लाख करोड़” इत्यादि.
अब यही सवाल बाल बुद्ध से किया गया, जब सिद्धार्थ की शादी यशोधरा से होने वाली थी
अब बुद्ध राजा का बेटा था. उससे किसी ने यह नहीं पूछा की कितना पैसा है तुम्हारे पास.
लेकिन उसकी क्षमता की परीक्षा की गई.
परीक्षा के दौरान बुद्ध से यह सवाल भी पूछा गया दरबार में उपस्थित गणितज्ञ अर्जुन द्वारा:
बालक, 100 करोड़ (शत कोटि) के आगे की संख्याओं के नाम बता दो.
तो बुद्ध ने फ़ौरन बता दिए. अब मैं बुद्ध के जवाब मैं नहीं जाऊँगा.
उसको विस्तार से इस किताब में बताया है, जिसका शीर्षक है “ आर्य नस्ल की ऊटपटांग कल्पना का खंडन”.
आप लम्बा चौडा जवाब खुद देख ले.
यहां सिर्फ इतना समझा दूँगा कि इस सवाल का आर्य नस्ल की ऊटपटांग कल्पना से क्या सम्बन्ध है.
लेकिन उसके पहले यह समझा दूँ कि इसका आज के विषय से क्या सम्बन्ध है
आज का विषय है कि हमें कौन सा इतिहास लिखना चाहिए:
वंशवादी शासकों का इतिहास या विज्ञान और कला का इतिहास?
वंशवादी इतिहास तो बहुत लिखा है, आप सब ने पढ़ा होगा मुग़ल साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य, चोला साम्राज्य आदि के बारे में.
लेकिन इन साम्राज्यों में विज्ञान को क्या बढ़ावा मिला?
कला पर कुछ काम हुआ लेकिन विज्ञान पर नहीं,
क्योंकि विज्ञान का इतिहास लिखने के लिए दोनों इतिहास और विज्ञान जानना ज़रूरी है.
ऐसे लोग हमने तैयार ही नहीं किये.
सारी जगह वंशवादी इतिहासकारों ने घेर ली.
बाकी जगह बकवास करने वालों ने घेर ली
वैदिक गणित की झूठी बात करते हैं, विमान शास्त्र था, इत्यादि.
इससे क्या होता है, कुछ अनपढ़ लोगों को गर्व होता है, और बाकी दुनिया आप पर ठहाका मर कर हसती है.
वेद में जो असली गणित है उसकी बात नहीं करेंगे. जैसे यजुर्वेद में संख्याओं के नाम हैं
एक, दस, शत, सहस्त्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, अर्बुद (करोड़), न्यर्बुद (दस करोड़), समुद्र १०० करोड़), अन्त्य (हज़ार करोड़), मध्य (दस हज़ार करोड़), परार्ध (लाख करोड़)
यह आपको मालूम नहीं. यह सबके सामने स्पष्ट है,
इसका क्या महत्व है यह आगे जा कर समझाऊँगा.
दूसरी बात यह है कि केवल इतिहास और विज्ञान जानना काफ़ी नहीं है
मैथमेटिक्स और विज्ञान का फ़लसफा जानना भी जरूरी है.
जैसे कि १+१=२ होता है यह सब जानते हैं.
लेकिन मैथमेटिक्स में सबूत क्या, यह नहीं जानते.
इसलिए मैंने JNU में इसे साबित करने के लिए दस लाख का इनाम घोषित किया.
हर चीज़ में इसके होड़ लगी रहती है के हमने पहले किया
यह कोई नहीं सोचता कि हम ने अलग तरीके से किया,
जैसे मैंने आपको बताया कि मैथमेटिक्स में प्रत्यक्ष प्रमाण वर्जित है, लेकिन गणित में मंज़ूर है,
इसके कारण मैथमेटिक्स में १+१=२ में भी इतनी कठिनाई आती है.
लेकिन हमें क्या है? परीक्षा में तो कोई यह सवाल पूछता नहीं, तो जान के क्या करेंगे?
अब यह सब जान कर क्या फायदा होगा? आज की तारीख में?
क्योंकि असली इतिहास जो है वह अतीत के बारे में नहीं, भविष्य के बारे में है.
याने की इतिहास, और विज्ञान और उसका फ़लसफा सीख कर भविष्य में क्या करोगे?
बता दूँ कि विज्ञान के इतिहास और फलसफे का कोर्से विदेश में कई बार पढ़ाया.
अफ़्रीकी छात्र इससे बहुत उत्साहित थे. लेकिन हिन्दुस्तान में बहुत उत्साह नहीं है.
एक बार पढ़ाया.
संजय जी ने भी कोशिश करी. लेकिन विफल रही.
क्यों? क्योंकि हमने विज्ञान के इतिहास का महत्व नहीं समझा. यहाँ के विद्यार्थी और बुद्धिजीवी उसे विमान शास्त्र आदी बकवास से जोड़ते हैं.
क्योंकि आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे है, इस लिए यह बात भी समझा दूँ
हम गुलाम कैसे बने? पलाशी के युद्ध के बाद नहीं.
उस युद्ध के बाद हिन्दुस्तानियों का बहुत उत्पीड़न हुआ.
ब्रिटिश ने नरसंहार किया. हम मारे गए लेकिन गुलाम तब नहीं बने.
उपनिवेशवाद की शुरुआत शिक्षा प्रणाली के बदलाव से होती है.
वह कैसे करी? हमें मैकोले ने बताया: कि विज्ञान के क्षेत्र में पश्चिम बेहिसाब उत्कृष्ट है और आप बहुत तुच्छ हो.
इसलिए शिक्षा की पश्चिमी प्रणाली अपनाना चाहिए.
संक्षेप में दो लालच दिए: नौकरी मिलेगी और विज्ञान मिलेगा.
नौकरी तो मिल जाती है कुछ लोगों को.
लेकिन जिसे १+१=२ का कारण नहीं मालूम वोह क्या ख़ाक विज्ञान जानेगा?
खाली एक बात बता दूँ: मैकोले को दोष देना सरासर गलत है
बेरूत जाइये, वहाँ कोई मैकोले नहीं था, फ्रांसीसी हुकूमत थी, लेकिन शिक्षा प्रणाली वही है.
पेरू जाइये वहाँ कोई मैकोले नहीं था स्पेनिश हुकूमत थी लेकिन शिक्षा प्रणाली वही है.
सूरीनाम जाईये, वहाँ कोई मैकोले नहीं था, डच हुकूमत थी लेकिन शिक्षा प्रणाली वही है.
क्योंकि यह सभी चर्च की शिक्षा प्रणाली है.
मैकोले ने केवल चर्च का प्रचार दोहराया,
जो प्रचार क्रिस्तानी मज़हब से नहीं हमेशा इस बात से शुरू होता है:
तुम नीच हो, हम उत्कृष्ट है, हमारी नक़ल करो.
और यही बात उपनिवेशवादी शिक्षा प्रणाली सिखाती है: पश्चिम की नक़ल करो. सभी पश्चिमी चीज उत्कृष्ट है.
अब मैकोले ने किस आधार पर कहा कि पश्चिम उत्कृष्ट हैं?
विज्ञान के झूठे इतिहास के सहारे.
विज्ञान का यह झूठा इतिहास चर्च का बनाया हुआ है.
याने की चर्च ने आपको लल्लू बनाया,
आपकी शिक्षा प्रणाली बदल कर आपके बच्चों के दिमाग में झंडा गाड दिया.
और २०० साल तक आपके समझ में भी नहीं आया, कि यह चर्च का किया हुआ है और मैकोले को दोष देते रहे.
जब आप गुलामी का कारण ही नहीं समझे २०० साल तक, तो आज़ादी कैसे मिलेगी?
सुधार कैसे करें?
कई बार बता चुका हूँ. नवी कक्षा में जो युक्लिड की झूठी कहानी है उसे तोड़ो.
लेकिन आप को बात समझ नहीं आई.
हमें युक्लिड से क्या करना, बच्चा रट्टा मार के पास हो जाये और नौकरी मिल जाये.
इसलिये किसी ने कुछ किया नहीं.
लल्लू बने रहना है तो बने रहो. आपकी मर्ज़ी.
अब मेरी युक्लिड की किताब फ्रैंच और स्पेनिश में आ रही है, देखते हैं दूसरे देशों में कुछ होता है क्या.
आखरी बात यह बता दूँ. विज्ञान के इतिहास का आर्य नस्ल की ऊटपटांग कल्पना से क्या संबध है
जैसे कि आप को मालूम है, यह कल्पना की शुरुआत इस बात से हुई कि ग्रीक, लैटिन और संस्कृत में बहुत समानता है,
लेकिन इस में आश्चर्य की क्या बात है?
और इस समानता से ब्रिटिश हुकूमत को क्या तकलीफ हुई?
क्योंकि ग्रीक का बहुत महिमागान हुआ क्रुसेड के दौरान: यानी जो क्रिस्तानी जिहाद ५०० साल तक मुसलमानों के खिलाफ चला.
मुसलमानों से प्राप्त सारे ज्ञान का श्रेय ग्रीक को दिया,
क्योंकि ग्रीक ही अकेले क्रिस्तानियों के मित्र माने जाते थे,
और इस चाल से सारे दुनिया का ज्ञान क्रिस्तानियों की विरासत माना गया और उसका अनुवाद हुआ.
उस ग्रीक महिमागान में पिथागोर और युक्लिड भी शामिल है
और उसका इस्तेमाल आज भी चर्च के उसी प्रचार के लिए किया जाता है:
नवी के बच्चों को सिखाते हैं कि हिंदुस्तान की ज्यामिति तुच्छ थी,
ग्रीक ज्यामिति उत्कृष्ट थी, और उसकी नकल करें.
उससे क्या नुकसान होता है
क्योंकि आपने मैथमेटिक्स का फ़लसफा सीखा ही नहीं,
आप के समझ में नहीं आया कि चर्च ने इस मिथ्या के सहारे क्रिस्तानी धर्मशास्त्र मैथमेटिक्स में घुसेड़ दिया.
क्योंकि मैथमेटिक्स सभी क्षेत्र में लगता है
सारे ज्ञान पर पश्चिम का नियंत्रण हो गया.
इसलिए ग्रीक महिमागान का आज भी महत्व है.
संस्कृत और फ़ारसी और ग्रीक में समानता कोई आश्चर्य कि बात नहीं
क्योंकि फारस हिन्दुस्तान का पडोसी था,
और यूनान उसके साम्राज्य का हिस्सा था.
आखरी बात यह कह दूँ कि वेद में जो परार्ध तक गिनती है
वहाँ तक गिनती ग्रीक और लैटिन में नहीं
उनकी सबसे बड़ी संख्या myriad है याने कि १०,००००
उनका अंकगणित बहुत कमजोर था
इसलिए उन्होंने हिन्दुस्तानी अंकगणित अपनाया.
अंकगणित कमजोर था इसलिए विज्ञान भी कमजोर था
इसलिए कैलंडर बेकार था
इसलिए कोई आर्य ने वेद नहीं बनाया
क्योंकि वेद में बहुत आगे तक की गिनती है, जो यूरोपीय लोगों को वेद के हज़ारों साल बाद भी नहीं आती थी.
लेकिन आप को चर्च ने फंसा लिया, और नकल करना सिखा दिया
इसलिए आपने उनका वाहियात कैलंडर भी अपना लिया
और गिनती भी भूल गए
आपको गुलामी के अमृत काल का मुबारक हो.