धर्म की सांस्कृतिक नीव
The West taught us so.
क्या मझहब सिर्फ आस्था, विश्वास, भक्ति, की बात है? ऐसा हमने पश्चिम से सीखा है.
The West also taught us that religious faith must come from scriptures.
क्या यह ज़रूरी है कि यह आस्था किसी लिखित धर्म ग्रन्थ से जुडी है? पश्चिम ने हमें यह भी सिखाया कि धार्मिक आस्था को धर्म ग्रंथों से जोड़ना ज़रूरी है.
That is, to understand a text is it enough to know the language and not the subject?
किसी ग्रन्थ को समझने के लिए क्या भाषा का ज्ञान काफी है? विषय के ज्ञान की ज़रुरत नही?
अगर गणित पर कोई संस्कृत पुस्तक है तो उसका अनुवाद बगैर गणित जाने कोई संस्कृत पंडित कर सकता है क्या? शब्दार्थ और भावार्थ में फरक. शब्द प्रमाण.)
आज की तारीख में शब्दार्थ तो गूगल भी निकाल सकता है. भावार्थ के लिए विषय का ज्ञान ज़रूरी है.
अगर भाषा ही सब कुछ है तो बाइबिल को कौन सी भाषा में समझना चाहिये: इब्रानी, यहूदी, यूनानी, या लातिनी
विश्वास और अन्धविश्वास में क्या फर्क है? खास तौर से जब आस्थाएं टकराती हैं.)
क्या विज्ञान ज्ञान नहीं? क्या हम विज्ञान को पश्चिमी कह कर नकार सकते हैं? वफादारी सब कुछ है, ज्ञान की कोई ज़रुरत नहीं? )
क्या भारत में विज्ञान की कोई पद्धति नहीं थी? और अगर थी तो उसका धर्म से क्या सम्बन्ध है?
धर्म ज़िन्दगी से जुड़ा है, जो ज़िन्दगी हमें इस दुनिया में जीनी है. क्या हम जिंदगी और दुनिया को समझे बगैर धर्म समझ सकते हैं? और क्या हम दुनिया को समझे बगैर विज्ञान को समझ सकते हैं?
पश्चिम के विपरीत, हिंदुस्तान में विज्ञान और धर्म को अलग अलग खानों में नहीं रखा गया. हमारे यहाँ दोनों में प्रत्यक्ष प्रमाण मान्य है.
पायासी ने आत्मा की परीक्षा के लिए कई प्रयोग किये. ग्रन्थ में विश्वास नहीं किया.
पोथी का प्रमाण शब्द प्रमाण है जिसे बड़ी संख्या में लोगों ने नकारा.
क्या हमारे ग्रन्थ अनंत काल से मौजूद हैं? अगर नहीं, और हमारे पूर्वजों ने लिखे तो हमारे पूर्वजों का ज्ञान कहाँ से आया? क्या उन्होंने कभी गलती नहीं करी?
हमें जिससे ग्रन्थ मिले क्या उन्होंने भी कभी गलती नहीं करी? और इसकी क्या गारंटी है कि हमने उसे सही समझा?
जैसे हमने मान लिया कि भारद्वाज ऋषि ने हवाई जहाज और अंतरिक्ष यान पर ग्रन्थ लिखा.
शब्दों के साथ खिलवाड़ करना आसान है. ऐसा खेल करके प्रत्यक्ष के कई अर्थ निकले जा सकते हैं.
असली ज्ञान की परीक्षा प्रमाण से होती है, ग्रंथों से नहीं.
जिंदगी और दुनिया समझने के लिए, काल के बारे में समझना ज़रूरी है.
काल की वैकल्पिक अवधारणाएं समझना आसान नहीं है, कयोंकि काल की सामान्य अवधारणाएं भाषा से जुडी हैं, और हमारे विचार भाषा में होते हैं.
जैसे की होपी भाषा में काल की अवधारण अलग किस्म की है. भाषा में काल की अवधारणा के विरुद्ध अवधारणा समझाना मुश्किल है.
हिन्दू धर्म में "धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष" है, और बौद्ध धर्म में भी निर्वाण है. मोक्ष का अर्थ है पुनर्जन्म से मुक्ति. मोक्ष या निर्वाण का अर्थ पुनर्जन्म पर आधारित है? लेकिन पुनर्जन्म का क्या अर्थ है?
पुनर्जन्म विश्वास है या अन्धविश्वास है? अर्थ ही क्या है? पुनर्जन्म कब होता है? मृत्य के एकदम बाद? अगर एस तो हम पायासी के प्रयोगों से इसका पुष्टिकरण कर सकते हैं?
पुनर्जन्म का अर्थ निकलता है "लगभग चक्रीय काल" की अवधारणा से.
केवल जीव ही नहीं, सभी चीज़ दुबारा होती है.
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन |
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते || 16||
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु: |
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना: || 17||
अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे |
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके || 18||
भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते |
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे || 19||
क्या यह विज्ञान संगत है? क्या यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संभव है?